लॉक डाउन में बढ़ रही है नजदीकियां भी, एक नमकीन प्रेम कथा

हुआ यूं की घर में सेंव ख़त्म हो चुकी थी। मनीषा को थोड़ी ही सही पर सेंव की ‘फंक्की’ की तलब लगती थी। ये उसकी बचपन की आदत है। सभी जगह सेंव का स्टॉक लगभग ख़त्म हो चुका था। कहीं से किसी का भी आना-जाना संभव नहीं। और ये रास्ता राजा जी ने खोजा। मनीषा को ऑफिस के काम में उलझा कर रसोई में अकेले ही सारी व्यवस्था जमा ली। चूंकि कई बार वे सब्जी शौक से बनाते हैं इसलिए मनीषा को शक नहीं हुआ। पर जब वो काम पूरा कर के खाने पर पहुंची तो उसे सेंव बनी हुई मिली।
“कितना मधुर...कितना मदिर ....तेरा मेरा प्यार...” की धुन तो जरुर निकली होगी मनीषा के दिल से। सेंव भले ही नमकीन हो, पर शहद से मीठे प्यार ने उसे कितना सुस्वादु बना दिया होगा। उसका मैसेज कितना सच्चा था- “मैं क्यों न भाग्य पर इठलाऊं”.
चाहिए ही क्या होता है पत्नी को अपने पति से, प्यार...परवाह...इज्जत...सम्मान. बाकी सब चीजें निरर्थक हैं। ये राजा जी के प्यार जताने का ही एक रंग है। प्यार की अभिव्यक्ति। परवाह करने का तरीका।जरुरी तो नहीं कि आप हमेशा महंगे तोहफे ही दें, आसमान उतार लाने के वादे करें। फूलों से ही प्यार का दिखावा करें। प्यार करने व जताने के भी हजारों रंग हैं....बस नजरिया बदल कर देखिए। जिंदगी कितनी खुशगवार हो जाती है। मनीषा-राजाजी की तरह।
ये किस्सा उतना ही सच्चा है जितना शाश्वत प्रेम। नोंक-झोंक के साथ प्यार भरा जीवन कितना रसभरा होता है, बशर्ते की प्रेम की चाशनी में डूबा हुआ हो। कोई ईगो नहीं, कोई जोरू का गुलाम नहीं। जहां अलगाव/प्रताड़ना/उकताहट का आंकड़ा इस लॉक डाउन में बढ़ रहा वहीं ऐसा प्यार अपनी खुशबू से सुरभित भी कर रहा है। अपनी वामा, अपनी अर्धांगिनी के सुख और खुशी का ख्याल रखना आपके व्यक्तित्व को और निखारता है। यही पुरुषत्व का सबसे उत्तम गुण है। मनीषा भी उनके लिए उतनी ही समर्पित और जान छिड़कने वाली है। दो जिस्म एक जान। दोनों ही पत्रकारिता के आसमान के चमकते हुए सितारे हैं। 24 घंटे काम में व्यस्त। बावजूद उसके एक दूसरे में खोए, चंदा-चांदनी सी अपनी जिंदगी में शीतल प्रेम की छठा बिखेरते हुए औरों के लिए आदर्श।
एक पत्नी तब और निहाल हो जाती है जब उसका पति सार्वजनिक तौर पर अपनी और अपने परिवार की समस्त उपलब्धियां/नाम/शोहरत अपनी पत्नी के नाम समर्पित कर देता है। उसके प्यार और समर्पण को स्वीकारता है। पैरों में दर्द होने पर चढ़ाव/सीढियां चढ़ते/उतरते रुक कर उसका हाथ थमता है। सहारा देता है। पत्नी के शौक, पत्नी की पसंद में उसका साझेदार होना पत्नी के चेहरे का नूर बढ़ा देता है।
प्रेम तो सभी करते हैं। पर हमारे हिंदुस्तान में नफरत खुल के बंटती है और प्यार/प्रेम छुप कर करना पड़ता है। कितना अजीब है हमारा देश। प्रेम को पूजा मानता है पर प्रेम करने उसकी अभिव्यक्ति को पाप। उदाहरण भरे पड़े हैं अधूरे प्रेम किस्सों के। उस पर पति-पत्नी का प्यार... अरे बाप रे!! वो तो केवल एक ही नाम पाता है आज भी ‘बेशर्माई’ जब कि वेद भी कहते हैं-
ऊंचाई पर रखे घरेलू सामान के उतारने/रखने में मदद करना। कभी-कभी बाथरूम धो देना। बेड शीट/ पिलो कवर बदलना, पत्नी के रिश्तेदार/दोस्तों के आने पर चाय-नाश्ते का इन्तजाम पति द्वारा ही कर देना, पति का कपड़े धोने में हेल्प करवा देना ये सब भी तो प्यार के ही रंग हैं। बशर्ते कि इन्हें स्वेच्छा से जिम्मेदारी के तहत किया गया हो। ऐसा कर देने से एक दूसरे के प्रति सम्मान के साथ साथ दोनों परिवारों के बीच प्रेम की नींव बनती है।
एक दूसरे के नाश्ते व खाने का ख्याल आपको और करीब लाता है। स्वास्थ्य ठीक न होने पर दवा से ज्यादा प्रेम व परवाह काम करती है। प्रेम की झिड़की, अपनेपन की लताड़ आपके प्रेम को और गहरा रंग प्रदान करती है। परन्तु इसमें जब स्वार्थ और सत्ता की बू हो तो वह प्रेम नहीं रह जाता। हमारे यहां दिक्कत प्रेम में ही नहीं, पति-पत्नी के प्रेम में भी है। शिव-पार्वती, राम-सिया के पूजन करेंगे पर प्रेम गीत वो राधा कृष्ण के ही गाएंगे। जबकि प्रेम का स्वरूप अवर्णनीय है।
प्रेम-बंधन कई प्रकार के हैं। प्रेम बंधन उस भंवरे के समान होता है जो लकड़ी को भेद देने की शक्ति रखता है पर प्रेम में आसक्त हो रात भर कमल के मुकुलित हो जाने पर, उसी में बंद हो बंधा पड़ा रहता है। इसमें वो ताकत है कि दूर रहते हुए भी कभी न मुरझाता है वैसे ही जैसे ‘आदित्य’ गगन में रहता है पर कमलिनी नीचे धरती पर विकसित होती है। शुद्ध प्रेम के लिए दुनिया में कोई बात असंभव नहीं।
प्रेम में ‘स्मृति’ का ही सुख है। वही तो प्रेम के प्राण हैं। हमें प्रेम को व्याधि के रूप में देखना छोड़ कर संजीवनी शक्ति के रूप में देखना चाहिए। संयम व समर्पण के आधार वाला प्रेम ही आजन्म टिके रहने की समर्थता रखता है। हमारे देश में विवाह को अनुबंध मान लिया गया है। स्वयंवर वाले राष्ट्र में अभी भी विवाह कर दिया जाता है, करा दिया जाता है। ऐसा कम ही है कि खुद पसंद से किया जाता है। फिर शुरू होती है कठिनतम दाम्पत्य प्रेमयात्रा। पवित्र अग्नि को साक्षी मान कर सात वचनों से बंधी हुई पर उन वचनों के पालन का भार केवल पत्नी से अपेक्षित किया जाने लगता है।
पति लापरवाह भी हो तो दोषी नहीं पर अब ऐसा नहीं है। अच्छे विचारों की ‘मंगल-छाया’ अब इस रिश्ते को पल्लवित करने लगी है। अब पति भी अपनी पत्नी के साथ हरतालिका व्रत व करवाचौथ व्रत करने लगे हैं। समाज/लोग क्या कहेंगे व दकियानूसी विचारधाराओं से इतर नए रिश्तों की संरचना करने में जुटे हैं जो बेहद सुखद व आदर्श स्थापित करने वाले हैं। एक बेहद समर्पित, प्रेमिल, वफादारी के रंग से रंग रिश्ता...प्रेम के हजारों रंग हैं, आप कौनसा रंग देखना पसंद करेंगे ये आप पर निर्भर करता है...
Credit Web Duniya
0 Comments: